हम बाबासाहब को तो मानते है पर बाबासाहब की नहीं मानते

 

डाॅ मनीषा बांगर
डॉ. जे डी चन्द्रपाल 

जब तक साँस चलती रहती है तब तक जीवन चलता रहता है; मगर जब साँस रूक जाती है तो जीवन समाप्त हो जाता है |

मगर क्या किसी महान व्यक्ति का जीवन उनकी साँस रूकने पर थम जाता है ?

babasaheb-ambedkar speaking

 ऐसा कहा जाता है की किसी व्यकित की महानता वे भौतिक एवं शारीरिक रूप से कितने साल जिए उस पर निर्भर नहीं करती बल्कि वे अवाम के दिलो दिमाग में एक भावात्मक रूप से एवं वैचारिक रूप से कितने साल जिन्दा रहते है उस पर निर्भर करती है | 

यह भी तथ्य पूर्ण है की जब तक उस महान व्यक्ति के विचार जिन्दा रहते है तब तक वह महान व्यक्ति मर नहीं सकते |

महान व्यक्ति के जीवन काल में उनके जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण होते है उनके कवन जो आने वाली कई पीढियो को एक बेहतरीन जीवन की शिक्षा देता रहता है और मानवता के श्रेष्ठ मुकाम तक ले जाता है | और इसी संदर्भ में महान व्यक्ति को याद किया जाता है या सदैव स्मरणीय रखा जाता है |

बाबासाहब डॉ आंबेडकर का जन्म १४ अप्रैल १८९१ के दिन हुआ था और उनका परिनिर्वाण ६ दिसंबर १९५६ के दिन हुआ | अर्थात बाबासाहब डॉ आंबेडकर के जीवन का सफ़र जो है वह ६५ साल का रहा |

मगर बाबा साहब डॉ आंबेडकर तो युग पुरुष थे; उन्होंने केवल ६५ साल का जीवन नहीं जिया बल्कि ६५ साल की कालावधि में कई युग जी लिए थे और एक ऐसा मूल्यनिष्ठ जीवन जो सदियों तक नयी पीढ़ीयों को एक बेहतरीन जीवन जीने की प्रेरणा देता रहेगा | उनके विचार मूल्य युगों तक समाजजीवन में मार्गदर्शन करते रहेंगे |

महामानव बाबासाहब डॉ भीमराव अम्बेडकर की 126 वी जन्मजयंती का वर्ष चल रहा है; हर साल उनकी जन्म जयंती, वैयक्तिक, संस्थानिक एवम् सरकारी स्तर पर उत्सव के रूप में मनायी जाती है |

शुरू शुरू में तो कोई भी उत्सव आस्था और श्रध्धा का प्रतिक होता है मगर धीरे धीरे वह आनंद – प्रमोद – उत्साह का विषय मात्र बनकर रह जाता है | फिर उन उत्सवो का किसी भी वैचारिक आधार के साथ बहुत ज्यादा सम्बन्ध नहीं रहता | इसमें भी जब यह किसी व्यक्ति विशेष के साथ जुडा होता है तब तो वह व्यक्तिपूजा से कुछ भी विशेष नहीं रह जाता |

कभी कभी तो इन उत्सवो का स्वरुप ऐसा दिखाई देता है की जैसे की वह उन महापुरुषों की विचार मूल्यों से बिलकुल विपरीत हो |

कुछ ऐसा ही हो रहा है डॉ बाबासाहब अम्बेडकर के जन्मजयन्ती महोत्सवो में | उत्सव के चकाचौंध में उनके विचार मूल्य मुर्ज़ाते हुए नजर आते है; संक्रमणकालीन अवस्था में इन विचार मूल्यों की प्रासंगिकता ही नहीं रहती इसीलिए वे मार्गदर्शक नहीं बन पाते और धीरे धीरे आन्दोलन दिग्भ्रमित हो जाता है |

कुछ ऐसा ही नज़ारा आज हमें अम्बेडकरी चेतना के सन्दर्भ में देखने को मिल रहा है |

कभी कभी तो ऐसा भी लगता है की डॉ बाबासाहब अम्बेडकर के अनुयायी बाबा को तो मानते है मगर बाबा की नहीं मानते |

एक तरफ तो उत्सव मनाया जाता है तो दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर की मूल विचारधारा से किनारा किया जा रहा है | उनके द्वारा दी गई चेतावनीओ को नजर अंदाज किया जा रहा है |

२५ नवम्बर १९४९ के दिन संविधान सभा में उन्होंने जो आशंका या भय व्यक्त किया था उसी अनुसार आज हमारा देश एक बहुत ही विसंगति पूर्ण जीवन से गुजर रहा है |

एक सामाजिक नियतिवाद होता है और एक सामाजिक गतिवाद होता है – आज हमारे देश में सामाजिक नियतिवाद एवं गतिवाद के बिच कड़ा संघर्ष चल रहा है |

इस संघर्ष के बीच डॉ अम्बेडकर के जीवन का जो ध्येयवाद है वह पीसता नजर आ रहा है | समता, स्वतंत्रता एवं न्याय के महान विचार मूल्यो की बलि चढ़ती नजर आ रही है | ब्राह्मणवाद, वैश्विक सामन्तवाद से हाथ मिलाकर गुर्राता हुआ नजर आ रहा है | संविधान की उद्देशिका में रखे गये मानवीय मूल्यों के आधार पर अखंड भारत का निर्माण केवल मात्र ख्वाब ही नजर आ रहा है | इन सारी परिस्थितियों के मूल में ऐसी स्थिति "बाबा को मानना पर उनकी नहीं मानना" ही है |

बाबासाहब ने 17 अगस्त 1952 के दिन सिद्धार्थ कोलेज मुंबई में मुंबई और मध्य प्रदेश प्रान्त के कार्यकर्ताओ की संबोधित करते हुए कहा था की

"एक युग में एक व्यक्ति के लिए जो कुछ भी कर पाना संभव था वह मैंने आप लोगो के लिए किया.. मेरे कुछ मार्ग सफल भी हुए, कुछ नहीं भी हुए, लेकिन मैंने बड़े धैर्य के साथ अपना काम चालू रखा .... सिर्फ मेरा नाम लेकर मेरी जय जयकार करने से तो अच्छा है जो बात मेरी दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है उसे पूरा करने के लिए अपने प्राण की बाज़ी लगाओ"

मगर क्या हो रहा है जय जयकार के अलावा? ...

अगर जय जय कार के अलावा कुछ नहीं हो रहा है तो इसका सीधा मतलब है की हम बाबा को तो मानते है लेकिन बाबा की नहीं मानते. दुनिया में महापुरुख हुए है और उनके नक़्शे कदम पर चलने वाले अनुयायी भी हुए है; दुनिया भर के अनुयायी न केवल अपने महापुरुख की जयजयकार करते है बल्कि उनके विचारो पर चलने की कोशिश भी करते है. और हम क्या कर रहे है ..?

हम बाबासाहब को तो मानते है पर बाबासाहब की नहीं मानते.

क्या कहा था बाबा साहब ने जो आज के सन्दर्भ में बहोत ही महत्वपूर्ण है ? याद कीजिये...

26 नवम्बर 1949 को हमारे पुरखो ने संविधान को स्वीकार किया; उसके पहले की शाम अर्थात 25 नवम्बर 1949 की शाम बाबासाहब ने संविधान सभा में अपने विचार एक चेतावनी भरे स्वर में रखे थे और उस वक्तव्य में कहा था की.....

"हम 26 जनवरी 1950 को एक विरोधाभास पूर्ण जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में हमें समानता प्राप्त होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता राजनीति में हम "एक व्यक्ति एक मत" और "एक मत एक मूल्य" के तत्व को स्वीकार करेंगे और अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के तत्व को अपने सामाजिक, आर्थिक ढांचे के तर्क के आधार पर नकारते रहेंगे। हम कब तक इस विरोधाभास पूर्ण जीवन में रहेंगे? अगर हमने इस ज्यादा वक्त तक नकारा तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डालेंगे। हमें जल्द से जल्द इन विरोधी तत्वों को हटाना हैं वरना जो इस असमानता को भोग रहे हैं, वे इस राजनीतिक लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा देंगे, जिसका इस सभा ने इतनी मेहनत से निर्माण किया है।"

आज इस विराधाभास ने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया है.

यह जो कौमवाद, जातिवाद, प्रांतवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद ... जो भी देखने को मिल रहा है यह बाबासाहब की चेतावनी को अनसुनी करने का नतीजा है; सामाजिक एवं आर्थीक ढांचे पर समानता के मूल्यों को नकारने का नतीजा है |

और इसीलिए ही सामाजिक और आर्थिक जीवन की असमानता से पीड़ित लोग आज लोकतंत्र की धज्जिया उड़ाने पर उतारू हो गए है |

ऐसा नहीं की बाबासाहब ने केवल आने वाले संकट की चेतावनी दी; उन्होंने इस संकट से उबरने का उपाय भी उसी वक्तव्य में बताया था यह कहते हुए की "वे लोग जो हजारो जातियों में और सम्प्रदायों एवं धर्मो में विभाजित लोग कैसे एक राष्ट्र हो सकते है ?"

उन्होंने कहा था की ....

"जितना शीघ्र हम यह महसूस करें की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ में हम अभी भी एक राष्ट्र नहीं है, उतनाही हमारे लिए अच्छा होगा. तब कहीं जाकर हम एक राष्ट्र बनने की आवश्यकता को महसूस करेंगे और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रस्ते और साधनों को जुटाने के बारे में गंभीरता से सोचेंगे. इस लक्ष्य की प्राप्ति बहुत ही कठिन होते जा रही है..... .....भारत में जातियां है, ये जातियां राष्ट्र विरोधी है क्योंकी वे जाति जाति के बीच इर्ष्या एवं विरोध उत्पन्न करती है. किन्तु यदि हमें एक राष्ट्र बनाना है तो इन तमाम कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करनी पड़ेगी. क्योंकि भातृभाव तभी एक तथ्य बन सकता है जब कोई राष्ट्र हो"

यह थे बाबासाहब के विचार और इनमे ही संजोया हुआ था एक खतरनाक राष्ट्रिय संकट से उबरने का उपाय; मगर हम क्या कर रहे है? ठीक वही जो उन्होंने कहा था वह या कुछ और ?

आज हम आरक्षण का समर्थन या विरोध तो करते हैं मगर आरक्षण जिस बुनियाद पर खड़ा है उस जाति को ख़तम करने के लिए कुछ भी नहीं कर रहे है | बाबासाहब ने कहा था की मेरी जयजयकार मत करो... मगर मेरी लिए जो ज्यादा महत्वपूर्ण है (जातियों का विनाश) उसे पूरा करने के लिए अपने प्राण की बाज़ी लगाओ. हम उनकी जन्म जयंती के अवसर पर भक्ति का सैलाब लाते तो नजर आ रहे है बल्की हम बाबासाहब के मिशन को उनकी वैचारिकी के आधार पर अंजाम देते हुए नजर नहीं आ रहे है और कभी कभी तो उनके जीवन के ध्येयवाद से कुछ विपरीत ही करते हुए नजर आते है |

अगर हम बाबासाहब की विचारधारा को समजने की कोशिश करेंगे तो हमें उनके जीवन का जो ध्येयवाद है वह समज में आ जायेगा;

यही ध्येयवाद को उन्होंने संविधान की उद्देशिका में डाला हुआ है जिसमे भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गण राज्य बनाने के लिए समस्त नागरिको को क्या करना चाहिए उस दृढ संकल्प को जाहिर किया गया है |

अब सबसे बड़ा सवाल यह है की

क्या हम उस दिशा में कार्य करने के लिए दृढ संकल्पित हुए है ? क्या समाज में सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक न्याय लाने के लिए हम कृत निश्चयी है ? क्या हम विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, और उपासना की स्वतंत्रता का आदर करते है ? क्या हम प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त है ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल की इन सबमे व्यक्ति गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्पित है ?

अब फिर से एक बार नए सिरे से यह चिंतन करने की आवश्यकता निर्माण हुयी है की

हमारे व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय के जो महान मानवीय मूल्य है उसकी क्या अहमियत है ? कहीं ऐसा तो नहीं की सार्वजानिक जीवन में हम इन महान मूल्यों की वकालत करते है और व्यक्तिगत जीवन में बिल्कूल इससे विपरीत आचरण करते है ?

यह विरोधाभास ही हमें ले डूबेगा |

बाबासाहब कहते थे की सिद्धांततः हम लोगो ने वह संविधान पा लिया है जो समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय की बात करता है मगर व्यवहारतः हमें सच्चे राष्ट्रीय जीवन के इन सद्गुणों को ग्रहण करना है | क्या हम सच्चे राष्ट्रीय जीवन के इन सद्गुणों को ग्रहण करने के लिए और इस तरह से राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए कृतनिश्चयी है ?

इस दृष्टि से डॉ अम्बेडकर के जो विचार है, उनके जीवन का जो ध्येय वाद है वो न केवल प्रासंगिक है मगर अति आवश्यक और अनिवार्य भी है |

क्या था डॉ अम्बेडकर का जीवन ध्येयवाद ? चलो इसको भी उनके ही शब्दों में जानने की कोशिश कर लेते है |

3 अक्तूबर 1954 को बाबासाहब ने आल इंडिया रेडियो दील्ही केंद्र से जनता को संबोधित करते हुए कहा था की

"मेरे जीवन का विचार दर्शन अर्थात ध्येयवाद तिन शब्दों में समाहित है ... वह तिन शब्द है स्वतंत्रता, समानता और बंधुता.... मेरे जीवन दर्शन में ध्येयवाद के रूप में स्वतंत्रता का महत्व है लेकिन बेलगाम स्वतंत्रता समानता के लिए खतरनाक होती है. इसलिए स्वतंत्रता महत्वपूर्ण होते हुए भी वह समानता से बढ़कर नहीं है. मेरे जीवन दर्शन में समानता का स्थान स्वतंत्रता से ज्यादा ऊँचा है . कभी कभी असीम समानता भी स्वतंत्रता के अस्तित्व में रोड़ा बन जाती है. इसलिए मेरे जीवन के ध्येयवाद में स्वतंत्रता और समानता के अतिक्रमण से सुरक्षा मिले इसलिए कानून का महत्व स्वीकार किया गया है. लेकिन मैं कानून के महत्व को बहुत कम महत्वपूर्ण मानता हूँ. क्योंकि स्वतंत्रता और समानता के भंग होने पर कानून निश्चित तौर पर समर्थ होगा इस बात पर मुझे बिलकूल ही यकीन नहीं है. यहाँ मैं भातृत्व (भाईचारा, बंधुता) को सबसे ऊँचा स्थान देना चाहता हु क्योंकि स्वतंत्रता और समानता को नकारा गया तो उस समय भाईचारा ही वास्तव में रक्षक बनता है. सहभाव भाईचारे का ही दूसरा नाम है और भाईचारा या प्रेमभाव ही धर्म का दूसरा नाम है. इसका कारन यह है की क़ानून धर्म से परे है इसलिए कोई भी आदमी उसे भंग कर सकता है. लेकिन सहभाव या धर्म पवित्र होने के कारण उसका सन्मान करना हर आदमी का कर्तव्य है .....

आज भारत का नागरिक दो अलग अलग ध्येयवादों से नियंत्रित है. संविधान की उद्देशिका में दर्शाया गया ध्येयवाद और धर्म में समाया हुआ सामाजिक ध्येयवाद एक दुसरे के विरोधी ध्येयवाद है. राजनीतिक ध्येयवाद के कारन स्वतंत्रता, समानता और सहभाव जैसे जीवन मूल्यों को मान्यता मिली है. फिर भी सनातनी प्रवृति के सामाजिक ध्येयवाद के कारन यह तत्त्व व्यवहार में अस्वीकार किये गए. इस तरह यह एक दुसरे का विरोधी जीवन कितने दिन चलने वाला है ? कभी न कभी एक दुसरे के शरण में जाना ही पड़ेगा, इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है. और मुझे अपने इस जीवन दर्शन या इस ध्येयवाद पर पूरा भरोसा है की आज भारत के बहुसंख्यक लोगो के लिए हितकारी जो राजनितिक ध्येयवाद है जो संविधान की उद्देशिका में निहित है वह सभीका सामाजिक ध्येयवाद होगा इस बात की मुझे उम्मीद है."

डॉ अंबेडकर का मानना था कि यदि देश में जल्दी से जल्दी सामाजिक लोकतंत्र नहीं लाया गया तो यह स्थिति राजनीतिक लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाएगी |

सामाजिक लोकतंत्र लाने के लिए जरूरी था सामाजिक क्षेत्र में स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की स्थापना | स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की स्थापना किये बगैर सामाजिक न्याय का सिध्धांत कभी भी मूर्त स्वरुप धारण नहीं कर सकता | यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की स्थापना का है जो जातिवादी मानसिकता को ख़तम किये बगैर संभव नहीं | इसलिए भारत सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र न रहे बल्कि यह सामाजिक लोकतंत्र बने इसलिए जाति को निष्प्रभावी बनाना अत्यंत जरूरी है | जाति जिन्दा है कुछ धार्मिक मान्यताओ के मनोविज्ञान के आधार पर; जब तक इस मनोविज्ञान में परिवर्तन नहीं किया जायेगा तब तक जातीया ख़तम नहीं होगी |

आज देखा यह जा रहा है की दो अलग अलग ध्येयवादो के बिच टकराव हो रहा है |

एक सामाजिक नियतिवादी ध्येयवाद है जो राजनितिक समानता को स्वीकृत करने के लिए मजबूर है पर सामजिक समानता के मुद्दे पर केवल उदासीन ही नहीं है बल्की उससे विपरीत है | इसी वजह से आज भारत के लोकतंत्र के सामने आतंकवाद, नक्सलवाद, कौमवाद, जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद जैसी अनेक चुनौतिया है, जो लोकतंत्र को खोखला करने पर उतारू है | ऐसी स्थिति में समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय यह वह मानवीय मूल्य है जो न केवल लोकतंत्र को मजबूत करेंगे बल्कि देश के समस्त नागरिको को मानवता के श्रेष्ठ मुकाम तक ले जायेंगे |

इसीलिए अगर हम समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय के आधार पर लोकतंत्र को मजबूत करते हुए देश के समस्त नागरिको को मानवता के श्रेष्ठ मुकाम तक ले जाना चाहते है तो

केवल बाबासाहब की जन्मजयन्ती की चकाचौंध से काम नहीं चलेगा बल्की बाबासाहब आंबेडकर के विचारो का आदर करना पड़ेगा और उनको प्रासंगिक मानते हुए अनुकरण एवं अनुसरण भी करना पड़ेगा | जन जन तक पहुँचाना पड़ेगा और इसके आधार पर जीवन पध्धति निर्माण हो इसके हरसंभव प्रयास करने पड़ेंगे तब कहीं जाकर सच्चे राष्ट्रिय जीवन के सद्गुणों को ग्रहण करने की दिशा में हमारा सही कदम होगा |

यही हो सकती है सच्ची श्रध्धांजलि |

तब कहीं जाकर हम कह सकते है की हम बाबासाहब को तो मानते है और बाबासाहब की भी मानते है |

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डाॅ मनीषा बांगर बामसेफ की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बहुजन सामाजिक विचारक हैं.

डॉ. जे डी चन्द्रपाल बहुजन विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

Picture courtesy: the internet.