दलितों बहुजनों का बौद्ध धर्म स्वीकार और हिन्दू शुभचिंतकों की षड्यंत्रकारी सलाह

 

संजय जोठे (Sanjay Jothe)

सभी दलितों ओबीसी और आदिवासियों द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने सलाह पर कई शुभचन्तकों की टिप्पणियाँ आतीं हैं जो बहुत कुछ सोचने को विवश करती हैं. ये मित्र बहुत सारे मुद्दों पर विचार करके कुछ लिखते हैं और उनका एकमात्र आग्रह यही होता है कि दलितों को हिन्दू धर्म नहीं छोड़ना चाहिए. इसका एक ही कारण नजर आता है कि वे हिन्दू धर्म को सामाजिक राजनीतिक रूप से कमजोर होता नहीं देख सकते. उन्हें दलितों शूद्रों आदिवासियों की कोई चिंता नहीं है, उन्हें केवल तथाकथित हिन्दू धर्म की चिंता है जिसकी न कोई परिभाषा है न ही जिसकी कोई नैतिकता या नैतिक आचार शास्त्र ही है. एक ऐसा धर्म जो अपने ही बहुसंख्य जनों को जानवरों से भी बदतर समझता है उसमे दलितों शूद्रों और आदिवासियों को रोके रखने का उनका आग्रह विचित्र लगता है.

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दलितों शुद्रो और आदिवासियों के धर्म परिवर्तन के कदम पर कई दार्शनिक सवाल उठाये गए हैं। ऊँचे स्तर के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सवाल उठाये गए हैं। मैं सभी मित्रों का हृदय से धन्यवाद करते हुए कुछ निवेदन करना चाहूँगा। इसमें मैं यह जोड़ूंगा कि इस ऊँचे स्तर पर सोचने के लिए दलितों गरीबों ओबीसी आदिवासी समाज को लंबा समय लगेगा। इसलिए नहीं कि वे कमजोर या पिछड़े हैं बल्कि इसलिए कि वे शोषक धर्म की घुट्टी कुछ ज्यादा ही पी गए हैं और बौद्ध शैली का नास्तिकवादि सुधार भारत में हजारों साल से हुआ ही नहीं है। जो पाखण्डी सुधारक आये भी हैं वे भी घूम फिरकर आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म को मानकर ही सुधार करवाते रहे हैं। ये धूर्त लोग हैं जो बीमारी और इलाज दोनों एकसाथ बेचकर धंधा चलते हैं।

मुझे जो सलाह दी गयी है वे दार्शनिक व समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में बहुत ऊँची बातें हैं। मैं पूछना चाहूँगा कि जिन सुविधा संपन्न लोगों को विकसित और सुशिक्षित समझा जाता है क्या उनमे धर्म के प्रति इतना वैज्ञानिक और तार्किक आउटलुक आ चूका है? हरगिज नहीं। तब अगर हम दलितों आदिवासियों से इसकी उम्मीद करेंगे तो ये अन्याय है। हमारा मकसद धर्म में मोक्ष की उपलब्धि नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन से समाज और राजनीति को बदलना है। बौद्ध धर्म में भी कमजोरियां हैं और रहेंगी। लेकिन इसके कारण हम दलितों को बुद्ध के निकट जाने से नहीं रोक सकते।

क्या हम आतंकवाद और हिंसा के इल्जाम को इस्तेमाल करके किसी मुस्लिम को इस्लाम से दूर करते है? या पाखण्ड और भेदभाव का तर्क देकर हिन्दू को हिन्दू धर्म से दूर करते हैं? नहीं न? दुनिया भर में यद्ध छेड़ने के इतिहास के आधार पर किसी ईसाई को ईसाइयत या जीसस से दूर करते हैं? तब सिर्फ दलितों ओबीसी और आदिवासी को ही ये सलाह क्यों दी जाती है उन्हें ही बुद्ध और बौद्ध धर्म से क्यों दूर किया जाता है? जब बौद्ध धर्म से सारी बुराइयां मिट जाएंगी तभी बौद्ध बनियेगा - ऐसा आग्रह षड्यंत्रपूर्ण है। यह चाल है दलित बहुजनो को पाखण्डी शोषक धर्म में रोके रखने की।

अंबेडकर ने नवयान दिया है जिसमे पाखण्ड अन्धविश्वास और अंध भक्ति का निषेध है।उस मार्ग पर धीरे धीरे बढ़ना होगा। अभी भारतीय दलित व् अंबेडकरवादी हर दृष्टि से कमजोर हैं फिर भी काम में लगे हैं परिणाम धीरे धीरे आएंगे। आ भी रहे हैं।

सोचिये कि हिन्दू या मुस्लिम या ईसाई इतने सम्पन्न और स्वतन्त्र होकर भी अपने धर्मों की बुराइयों को दूर न कर सके, उन्हें कोई दोष नहीं देता, लेकिन दलित जब बौद्ध धर्म की बात करते हैं तब हजारों दिशाओं से सलाहें आने लगती हैं कि बौद्ध धर्ममें ये खराबी है या वो खराबी है। हम जानते हैं इसमें कमियां हैं। लेकिन उन कुछ कमियों के बावजूद ये सर्वाधिक तार्किक धर्म है।

आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारने वाला और अप्प दीपो भव की बात करने वाला ये एकमात्र धर्म है। ये केंद्रीय बात है। और इस बात में वो क्षमता है, वो संभावना है कि सारे अन्धविश्वास पाखण्ड औरभेदभाव मिटाये जा सकें। परमात्मा और आत्मा ही सब बुराइयों की जड़ है। सारा सम्मोहन इन्हीं दो से आता है। बुद्ध इन्हें एकदम उखाड़ फेंकते हैं। इस दशा में न सिर्फ सामाजिक समता और सौहार्द बल्कि लोकतन्त्र और विज्ञान भी फलता फूलता है।

दलित जब बौद्ध धर्म की तरफ मुड़ता है तब वह अनात्म की तरफ मुड़ रहा है। वह ईश्वर या सृष्टिकर्ता के निषेध की तरफ मुड़ रहा है। सृष्टिकर्ता में भरोसा रखना अव्वल दर्जे की मूर्खता है, जो ये मूर्खता करते हैं उनसे पूछा जाये कि उनका सृष्टिकर्ता आजकल क्या कर रहा है, यदि वो कुछ कर रहा है तो उसे ही करने दो आप किस हैसियत से उसकी मदद कर रहे हैं? क्या वो कमजोर है जो उसे आपकी मदद की दरकार है?

धर्म के जगत में समाज परिवर्तन की धारणा और उसका औचित्य केवल बौद्ध धर्म मे ही संभव है। केवल बुद्ध के साथ ही समाज में बदलाव के लिए मेहनत संभव है। जो भगवान या ईश्वर अल्लाह या किसी अन्य सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता को मानते हैं वे दोगली बातें करते हैं। उन्हें समाज में बदलाव लाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अगर उनका ईश्वर अल्लाह या सृष्टिकर्ता सच में ही है तो वो आपसे बेहतर जानता है कि कब क्या बदलाव करना है, तब उसी पर भरोसा रखो न क्यों इतना कष्ट उठाते हैं ?

लेकिन सारे परमात्मा, आत्मा वादी दोगले होते हैं। वे परम् चैतन्य, शक्तिमान, दयावान परमात्मा और सृष्टिकर्ता में भरोसा रखेंगे और लोगों को समाज सुधार की बात भी सिखाएंगे। अरे भाई, गरीब इंसानों को क्यों दुःख दे रहे हो? अपने दयावान परमात्मा की दया का इस्तेमाल करो न? वो कब और किसके काम आएगी? अगर बदलाव नहीं आ रहा तो मतलब ये कि आपका दयावान ईश्वर या सृष्टिकर्ता या तो है ही नहीं या आपकी बजाय आपका शोषण करने वालों से मिला हुआ है। दोनों स्थितियों मे आपको उसे निकाल बाहर करना चाहिए।

बुद्ध इस समस्या का सुन्दरतम हल देते हैं।वे कहते हैं कि कोई परमात्मा या सृष्टिकर्ता नहीं होता और न उसकी दया या शक्ति ही होती है। इसलिए उससे उम्मीद करना बेकार है। अपनी मेहनत से ही खुद में या समाज में बदलाव संभव है। अन्य धर्म सिखाते हैं कि मेहनत भी करो और ईश्वर की दया में भरोसा भी रखो, दया उसी को मिलती है जो मेहनत करता है, इत्यादि। अब ये जलेबी जैसी बात है, गोल गोल घूमती है। मेहनत से दया मिलती है तो ऐसी दया दो कौड़ी की हुई। जो मेहनत न कर सके उसको क्या मरने के लिए छोड़ देंगे?

अब ये सब सवाल अन्य धर्मों के ईश्वर पर उठते हैं। फिर भी उन धर्मों के लोगों से सवाल नहीं पूछे जाते। लेकिन दलित जब बुद्ध की तरफ जाते हैं तब लंबे लंबे दार्शनिक सवाल पूछकर उन्हें भटकाने की कोशिश होती है। ऐसे सवाल उठाने वालों से मेरा एक निवेदन है कि ये सवाल आप पहले अपने सुशिक्षित परिवार में, अपने संपन्न समाज मे उठाइये। तब आपको पता चलेगा अभी उन्ही को हजारों साल लगेंगे आपके प्रश्नो का उत्तर देने में, ऐसे में अगर आप ये उम्मीद गरीब अनपढ़ शोषित दलितों से करते हैं तो आप षड्यंत्रकारी हैं, आप अपराधी हैं। और संपन्न समाजों सहित दलितों की लाचारी का कारण बस इतना है कि वे गलत धर्मों से और आत्मा परमात्मा से जुड़े हैं। जैसे ही वे निर्णयपूर्वक इन धर्मों से दूर होंगे और अंबेडकर के बताये ढंग से धम्म में प्रवेश करेंगे, वैसे ही बहुत कुछ होने लगेगा।

दलितों के बुद्ध धर्म स्वीकार को इस तरह देखिये। जानबूझकर उन्हें भटकाने की कोशिश न कीजिये। जो सुविधाभोगी और सवर्ण संपन्न लोग सलाह देते हैं उनसे निवेदन है कि आपके दार्शनिक प्रश्न या सुझाव पहले अपने परिवार में लागू करके देखिये तब आपको पता चलेगा हकीकत क्या है।

दूसरी बात ये कि कई हिन्दू और सवर्ण शुभचिंतक ये सलाह देते हैं कि दलितों शूद्रों आदिवासियों को हिन्दू धर्म में ही रुके रहकर संघर्ष करना चाहिए और इस धर्म और समाज की बुराइयों को दूर करना चाहिए. इसका मतलब हुआ कि दलितों शूद्रों आदिवासियों को हिन्दू धर्म में सुधार करना चाहिए.

ऐसे सलाहकार मित्र सलाह देते हैं कि धर्म परिवर्तन न करके इसी धर्म और समाज में रहकर इसे बदलो. लेकिन ये असंभव है क्योंकि शूद्रों और दलितों की तरफ से धर्म या समाज में सुधार के किसी भी प्रयास का स्वागत नहीं होगा. क्योंकि दलितों आदिवासियों को हिन्दू माना ही नहीं गया है. अब जिन्हें हिन्दू ही नहीं माना जाता वे हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज में कैसे सुधार करेंगे? क्या कोई मुसलमान या पारसी हिन्दू धर्म में सुधार कर सकता है?

क्या कोई हिन्दू इसाई धर्म में सुधार कर सकता है? उसी तरह दलित भी हिन्दू धर्म को नहीं सुधार सकता. वो केवल हिन्दू धर्म को छोड़ सकता है.

इन सलाहों में एक भयानक षड्यंत्र भी छिपा है. ये सलाहकार कहते हैं खालिस इंसान या नास्तिक बन जाओ. ऊपर ऊपर ये अच्छी लगती है. लेकिन इस सलाह में भयानक शातिर षड्यंत्र छिपा है. एक गरीब कौम कभी भी नास्तिक नहीं बन सकती. उसे कोई न कोई महापुरुष शास्त्र या धर्म चाहिए. आप नास्तिकता पर जोर देंगे तो ये गरीब नास्तिक होने का साहस और बुद्धि तो अर्जित नहीं कर पायेंगे लेकिन धर्म के सबसे घटिया रूपों के गुलाम जरुर हो जायेंगे.

साम्यवादी नास्तिकता ने भारत गरीबों बहुजनों की चेतना में में धेले भर का भी प्रभाव नहीं पैदा किया है. उनकी वजह से ये गरीब बहुजन लोग नास्तिक तो नहीं बने लेकिन मूर्ख और लम्पट कथाकार और प्रवचनकारों और बलात्कारी बाबाओं के गुलाम जरुर बनते गये हैैं.

धर्म की बहस को "धर्म एक अफीम है" कहकर सीधे नकारने से कोई फायदा नहीं होता, उलटा नुक्सान ही होता है. अगर समाज का समझदार वर्ग धर्म की बहस से बिना संघर्ष किये बाहर निकल जाए तो फिर धर्म में मूर्खों और पोंगा पंडितों का ही राज चलता है. इसमें समझदारों की ही गलती है, मूर्ख पोंगा पंडित तो इसका लाभ उठायंगे ही उनकी क्या गलती है, उनका काम ही यही है. आँख खोलकर देखिये भारत में यही हो रहा है.

धर्म को अफीम मानते हुए भी समझदारों को इस अफीम की वादी में घुसकर इसे साफ़ करना होगा. यही बौद्ध धर्म का प्रयास है. यही बुद्ध अंबेडकर और कृष्णमूर्ति की शिक्षा है.

नाले को साफ़ करने के लिए आपको नाले में घुसना होता है.

अफीम के खेत में घुसकर अफीम को साफ़ करने का तरीका बौद्ध धर्म है, कोरा साम्यवादी चिंतन या नास्तिकता इस खेत से पलायन सिखाता है. इस पलायन से ये खेत और ये खेती खत्म नहीं होती बल्कि इसे मिलने वाली चुनौती ही खत्म हो जाती है. हकीकत ये है कि लोगों को धर्म के नुक्सान से अवगत कराये बिना उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता.

वामपंथी चैम्पियन खुद अपने ब्राह्मणी कर्मकांड पूरे विधि विधान से करते हैं. बंगाल और केरल में वामपंथी मित्रों की शादियों और मृत्यु के कर्मकांड देख लीजिये आपको सब समझ में आ जायेगा.

दलितों शूद्रों को खालिस इंसान या नास्तिक बनने की सलाह देने से पहले इस देश के संपन्न वर्ग को नास्तिक बनाकर देखिये, वो कभी नहीं बनेगा. नास्तिकता की सलाह देने वालों के घरों में झांककर देखिये वे सामान्य से भी बड़े कर्मकांडी अन्धविश्वासी और भक्त निकलेंगे.

दलित आदिवासी और शूद्रों को नास्तिक नहीं बल्कि बौद्ध बनना है. ये नोट करके रखिये मित्रों. औपचारिक धर्म परिवर्तन की अभी आवश्यकता नहीं अभी सिर्फ व्यवहार और आचरण में बौद्ध हो जाइए बाद में अनुकूल समय पर विशाल संख्या में परिवर्तन होना ही है. इससे बड़ी कोई क्रान्ति नहीं. भारत को सभ्य बनाने का यही एक तरीका है.

और अंतिम बात, धर्म राजनीति और समाजनीति में चुनाव अच्छे बुरे के बीच नहीं होता बल्कि कम बुरे और ज्यादा बुरे के बीच होता है। हम अनन्तकाल इन्तेजार नहीं कर सकते कि फलाने धर्म में ढिकाने तरह का बदलाव आएगा तभी हम उसे स्वीकारेंगे। पानी में कूदकर ही तैरना सिखा जाता है। सभी दलित बहुजन अंबेडकर की दृष्टि लेकर जब बौद्ध बनेंगे तब वे उस धर्म को भी सुधार लेंगे।

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 Sanjay Jothe, Lead India Fellow, M.A.Development Studies, (I.D.S. University of Sussex U.K.) PhD. Scholar, Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai, India.