आम आदमी पार्टी का क्षणिक चमत्कार और अंबेडकरवाद को मिलती धीमी बढ़त

 

Sanjay Jothe

अभी भारत की राजनीति में जितने प्रयोग हो रहे हैं वे सब एक बड़े विस्तार में बहुत सारी संभवनाओं को खोल रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति से मोहभंग हो रहा है और नए मोह निर्मित हो रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण है AAP की सफलता जो एक शिक्षित और शहरी मध्यम वर्ग को अचानक सम्मोहित करके उभरी है। AAP असल में एक ऐसे शून्य को भरना चाहती है जिसकी निर्मिती के पूरे समाजशास्त्र और राजनीति से उसको खुद ही कोई गंभीर सरोकार नहीं है.

fight corruption

भ्रष्टाचार और स्वराज आदि इतने कामन और वेग से मुद्दे हैं कि इनको लेकर खडा हो जाना और वादे या दावे करना सबको पसंद आएगा. लेकिन असल मुद्दा ये है कि भ्रष्टाचार या स्वराज कि हीनता का वृहद् समाजशात्र और राजनीति क्या है? और इन्हें कैसे एड्रेस किया जाए. AAP के पास दूर दूर तक इसको लेकर कोई प्रपोजल नहीं है.

इसीलिये इनकी सैद्धांतिकी को चुनौती नहीं मिल रही, सैद्धांतिकी है ही नहीं तो चुनौती किसे देंगे? यही AAP की तात्कालिक सफलता का और दूरगामी असफलता का कारण है. बाकी दलित और वाम राजनीति की सैधान्तिकी, समाजशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र बहुत ठोस आधारों पर निर्मित हो रहा है. इसीलिये बहस में उलझने की या उलझे ही रह जाने की संभावना भी है. यही इनकी तात्कालिक कमजोरी और दीर्घकालिक ताकत है.

आजकल की सभी राजनीतियां राइट बेस्ड अप्रोच से प्रभावित हैं। यह प्रभाव बढ़ता जाएगा। अब धर्म, जाती, समुदाय विशेष से होने के नाते जो अधिकार हैं उन अधिकारों को मुद्दा बनाया जाएगा। अब इस तरह ठीक से देखें तो 'राईट बेस्‍ड सामाजिक नीतियों के आधार पर संगठित राजनीति' में राईट का असल अर्थ निकालें तो वह राईट या अधिकार मजदूर और दलित सहित स्त्री के एक नागरिक होने के नाते अधिकार ही हैं, लेकिन नागरिक की अमूर्त और सपाट परिभाषा में भारतीय समाजों के बाशिंदे फिट नहीं बैठते। वे नागरिक होने से पहले और बाद में बहुत कुछ और भी होते हैं। और ये बहुत कुछ उस नागरिक पर भारी पड़ता है।

इसीलिये नागरिकवाद पर और दलितवाद, मजदूरवाद और स्त्रीवाद आदि की सैद्धांतिकी हावी होगी। ये अलग बात है कि इन वादों को शुद्धतम राजनीतिक टूल में बदल देने के प्रपोजल अभी तक सही मायने में आ नहीं सके हैं। लेकिन अब अंबेडकरी राजनीति बहुत नई परिभाषाओं और टूल्स के साथ आ रही हैं जिससे बड़ी उम्मीद जग रही है।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि राइट को AAP जिस ढंग से परिभाषित कर रही है वह एक परिभाषा है, अंबेडकरवाद जिस परिभाषा को लेकर चल रहा है वह दूसरी है। पहली परिभाषा आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक होने की धारणा से आरंभ होकर उसी तक सीमित हो जाती है। अंबेडकरी परिभाषा शूद्र या अंत्यज या हिन्दू होने की धारणा से शुरू होकर आधुनिक लोकतान्त्रिक नागरिकता तक आती है और समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व तक जाती है।

मार्क्सवादी या वाम की राजनीति अतीत से मजदूर और किसान से शुरू करके वर्तमान नागरिक तक आती है और एक सुपरिभाषित सर्वहारा की तानाशाही तक जाती है।

इस प्रकार अंबेडकरी और मार्क्सवादी राजनीति के पास जो परिभाषा है उसके पास अपना विस्तीर्ण अतीत है जिसका अपना समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र और दर्शन भी है।

AAP के पास सिर्फ वर्तमान है जिसमें अतीत की ठोस जड़ नहीं है इसीलिये उसके द्वारा निर्मित होने वाला भविष्य स्वतंत्र और सुरक्षित नहीं रह पाएगा। उस भविष्य पर विराट अतीत और समाजदर्शन वाली विचारधाराएं हावी होंगी। अभी AAP को जो सफलता मिल रही है वह विकल्पहीनता के शून्य में एक तिनका विकल्प होने के नाते मिल रही है। यह AAP की प्रशंसा भी है और आलोचना भी है।

अंबेडकरी राजनीति या दलित बहुजन राजनीति की ताकत अब जिस तरह बढ़ रही है वह एक भयानक सच्चाई है। अब बीजेपी आरएसएस को भी राइट बेस्ड ढंग में "हिन्दू" होने के नाते "अधिकार" की बात उठानी पड़ रही है। जैसे दलित आदिवासी स्त्री और मुस्लिम विक्टिम रहे हैं और दिखाये गये हैं उसी तरह अब 'हिन्दू और हिंदुत्व' को विक्टिम बनाकर और बताकर उसके अधिकारों को रेखांकित किया जायेगा।

लेकिन आरएसएस का सनातन दुर्भाग्य ये है कि हिन्दू जैसी सामाजिक, राजनितिक, धार्मिक इकाई न तो कभी थी न हो सकेगी। हिन्दू और हिंदुत्व एक परजीवी अमरबेल है जो दूसरी असुरक्षित अपरिभाषित इकाइयों के खून पर पलती आई है।

इसलिए हिन्दू या हिंदुत्व का अस्तित्व शेष सुपरिभाषित इकाइयों के नष्ट होने पर या आपस में दुश्मन बने रहने की संभावना पर टिका हुआ है। अब कोढ़ में खाज ये कि अब राजनितिक रूप से हिंदुत्व और हिन्दू की आइडेंटिटी से ज्यादा SC, ST या ओबीसी की आइडेंटिटी तेजी से हावी हो रही है, यही बीजेपी आरएसएस का सबसे बड़ा सरदर्द है।

इस सारे संक्रमण और अनिश्चय ने जो शून्य और असमंजस रचा है उसमें तात्कालिक मुद्दों की टीस भी अच्छा प्ले कर रही है और भ्रष्टाचार जैसे गैर महत्वपूर्ण मुद्दे भी राजनितिक परिवर्तन का या लामबंदी का बहाना बन सके हैं। लेकिन ये एक बार हो चुका। अब AAP की इस सफलता के दोहराने की संभावना कम है।

बीजेपी आरएसएस या कोंग्रेस की असफलता की पृष्ठभूमि न हो तो AAP का चमत्कार खो जायेगा। यह एक गंभीर बात है। यह AAP को दूसरों की असफलता पर पलने वाला परजीवी ही बनाती है। AAP के पास उसका अपना कोई विधायक और विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक प्रपोजल नहीं है यह एक बड़ी कमजोरी है। खासकर आज के दौर में जबकि दक्षिणपंथ तेजी से विश्वभर में हावी ही रहा है, ऐसे में सँस्कृति और समाज के विमर्श में AAP की असमर्थता, तटस्थता या मौन भारी पड़ेगा। हालाँकि अभी तक यह मौन उसकी ताकत रहा है।

इसके उलट अंबेडकरी राजनीति इन मुद्दों पर हमेशा मुखर रही है। अंबेडकरी राजनीती एक सुविश्लेषित और लंबे अतीत से शुरू करके ठोस भविष्य को लेकर चलती है इसलिए उसका दायरा धीरे-धीरे ही सही लेकिन निर्णायक रूप से बढ़ रहा है।

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Sanjay Jothe is a Lead India Fellow, with an M.A.Development Studies,(I.D.S. University of Sussex U.K.), PhD. Scholar, Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai, India.

Illustration by Syam Cartoonist

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